परंपरा और विरासत के संगम में DVC Colony का 66वाँ सार्वजनिक दुर्गोत्सव


अंडाल : पारंपरिक रीति-रिवाजों, प्राचीन विरासत और धार्मिक आस्था के वातावरण में DVC Colony का 66वाँ सार्वजनिक दुर्गोत्सव श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया गया। छह दशकों से अधिक समय से चली आ रही यह पूजा आज भी अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराओं को अक्षुण्ण रखते हुए क्षेत्र के लोगों की भावनाओं, संस्कृति और सामाजिक सद्भाव का एक उज्ज्वल प्रतीक बनी हुई है।आधुनिक थीम की भव्यता और चकाचौंध से अलग, इस पूजा का प्रमुख आकर्षण पारंपरिक शैली में निर्मित एकचाला दुर्गा प्रतिमा है। एक ही चाल के अंतर्गत माँ दुर्गा और उनके संतानों की उपस्थिति बंगाल की पारंपरिक प्रतिमा-कला की समृद्ध विरासत को दर्शाती है। प्राचीन पूजा-पद्धति, धार्मिक रीति-रिवाजों और भक्तिमय वातावरण ने इस उत्सव को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की है। समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप आगे बढ़ते हुए भी अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखना इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है।इस दुर्गोत्सव की रौनक और सफलता में DVC के प्रिय प्रोजेक्ट हेड श्री अनिल कुमार जैन का आत्मीय सहयोग एवं योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है। पूजा के प्रति उनकी आत्मीयता, प्रोत्साहन और सहयोग ने उत्सव के माहौल को और अधिक समृद्ध बनाया है। उनकी उपस्थिति एवं सहभागिता DVC के कर्मचारियों, उनके परिवारों और स्थानीय निवासियों के बीच सौहार्द एवं आपसी सद्भाव के संबंधों को और मजबूत करती है। उनका सहयोग और उत्साह पूजा समिति के सदस्यों के लिए भी विशेष प्रेरणा का स्रोत है। DVC Colony के इस ऐतिहासिक दुर्गोत्सव के साथ उनका आत्मीय जुड़ाव निस्संदेह सराहनीय है।66 वर्षों की लंबी यात्रा में यह दुर्गोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि DVC Colony के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया है। बुजुर्गों की स्मृतियों से जुड़ा अनुभव, पुराने दिनों की भावनाएँ तथा नई पीढ़ी का उत्साह और सहभागिता इस पूजा की परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं।पूजा समिति के सदस्यों की निष्ठा, स्थानीय निवासियों के सहयोग और सभी के सामूहिक प्रयासों से यह उत्सव एक भव्य सार्वजनिक मिलन समारोह का रूप ले चुका है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ आपसी सौहार्द, एकता और भाईचारे का संदेश प्रसारित करना भी इस दुर्गोत्सव की प्रमुख उपलब्धि है।66वें वर्ष में प्रवेश करते हुए DVC Colony के इस सार्वजनिक दुर्गोत्सव ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि समय बदलने के बावजूद परंपराओं का आकर्षण कभी फीका नहीं पड़ता। पारंपरिक एकचाला प्रतिमा, चिरपरिचित रीति-रिवाजों और लोगों की आत्मीय सहभागिता के माध्यम से यह पूजा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बंगाल की संस्कृति, विरासत और सामाजिक सद्भाव का एक प्रेरणादायी उदाहरण बनी रहे—यही सभी की हार्दिक कामना है।

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